लोकसभा के बाद अब वक्फ संशोधन विधेयक 2023 राज्यसभा से भी पारित हो चुका है। यह विधेयक अब राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पास अंतिम मंजूरी के लिए भेजा गया है। राष्ट्रपति की स्वीकृति के बाद यह विधेयक राजपत्र में अधिसूचित होगा और कानून का रूप ले लेगा। हालांकि इस विधेयक के पारित होने के साथ ही बिहार की राजनीति में नई हलचल शुरू हो गई है। खासकर जेडीयू में मुस्लिम नेताओं का इस्तीफा एक के बाद एक सामने आ रहा है, जिससे पार्टी पर दबाव बढ़ गया है।
बिहार में वक्फ विधेयक से नाराजगी, जेडीयू को झटका
बिहार में वक्फ संशोधन विधेयक को लेकर मुस्लिम समुदाय में असंतोष देखा जा रहा है। जनता दल यूनाइटेड (जेडीयू) के छह मुस्लिम नेताओं ने अब तक इस्तीफा दे दिया है और संभावना है कि आने वाले दिनों में यह संख्या और भी बढ़ सकती है। इस्तीफा देने वाले नेताओं में कई पुराने और प्रभावशाली नाम शामिल हैं। विशेषज्ञ मानते हैं कि आगामी बिहार विधानसभा चुनाव से पहले यह मुद्दा सियासी रूप से अहम हो गया है। मुस्लिम नेताओं का यह कदम न केवल जेडीयू के लिए चिंता का विषय है, बल्कि इससे महागठबंधन और विपक्ष को भी नया मुद्दा मिल गया है।
बिहार में मुस्लिम वोट बैंक का समीकरण
बिहार की जनसंख्या में मुस्लिम समुदाय की हिस्सेदारी लगभग 16.9% है। राज्य की कुल आबादी लगभग 10.4 करोड़ है, यानी लगभग 1.76 करोड़ मुसलमान। इस वोट बैंक का सियासी महत्व कभी भी कम नहीं रहा है। आंकड़े बताते हैं कि 2015 और 2020 के विधानसभा चुनावों में मुस्लिम मतदाता महागठबंधन की ओर अधिक झुके रहे।
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2015 में: महागठबंधन को 76% मुस्लिम वोट मिले, जबकि एनडीए को महज 5%।
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2019 लोकसभा में: महागठबंधन को लगभग 77% मुस्लिम वोट मिले, वहीं एनडीए को केवल 6%।
यह स्पष्ट है कि मुस्लिम मतदाता पारंपरिक रूप से एनडीए के विरोध में रहे हैं, लेकिन जेडीयू के लिए ये झटका और गहरा है क्योंकि नीतीश कुमार मुस्लिम समुदाय के बीच अपनी सॉफ्ट इमेज के लिए जाने जाते रहे हैं।
जन सूराज की एंट्री और मुस्लिम वोटों पर नजर
राजनीतिक रणनीतिकार से नेता बने प्रशांत किशोर की पार्टी जन सूराज भी वक्फ विधेयक का विरोध कर रही है। जानकारों का मानना है कि वह मुस्लिम मतदाताओं में अपनी पकड़ मजबूत करने की कोशिश कर रहे हैं।अगर जन सूराज इस वर्ग को अपनी ओर मोड़ने में सफल होती है तो यह महागठबंधन के लिए भी चुनौती बन सकता है। वहीं, बीजेपी और जेडीयू का मानना है कि वे 83% वोट बैंक को साधने के लिए 17% मुस्लिम वोट बैंक की नाराजगी को सहन कर सकते हैं।
क्या मुस्लिम नेता नीतीश से पूरी तरह टूट गए हैं?
न्यूज़ 24 के वरिष्ठ पत्रकार अमिताभ ओझा बताते हैं कि जेडीयू के अल्पसंख्यक नेताओं में निराशा है। उनका मानना था कि नीतीश कुमार मुस्लिम समुदाय के 14 सुझावों पर गौर करेंगे, लेकिन अंतिम विधेयक में केवल 3 सुझावों को ही शामिल किया गया। हालांकि यह भी सच है कि पिछली बार जेडीयू ने 11 मुस्लिम प्रत्याशी मैदान में उतारे थे लेकिन एक भी सीट नहीं जीत पाई थी। यानी नीतीश कुमार को मुस्लिम समुदाय से उतनी उम्मीदें नहीं हैं जितनी अतीत में थीं।
क्या वक्फ विधेयक के विरोध से कोई बड़ा नुकसान होगा?
राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि यह विधेयक एक रणनीतिक कदम हो सकता है। बिहार की राजनीति जातिगत समीकरणों पर आधारित रही है और नीतीश कुमार जानते हैं कि मुस्लिम वोट उनकी मजबूरी नहीं हैं। हालांकि, यह कहना भी गलत नहीं होगा कि वक्फ विधेयक जैसे संवेदनशील मुद्दों पर पार्टी की छवि जरूर प्रभावित होती है। विशेषकर तब जब विरोध भीतर से ही आने लगे।
पिछले चुनाव के आंकड़े क्या कहते हैं?
2020 के विधानसभा चुनाव में बिहार की 243 विधानसभा सीटों में से:
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एनडीए: 125 सीटें (बीजेपी: 74, जेडीयू: 43)
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महागठबंधन: 100 सीटें (आरजेडी: 75, कांग्रेस: 19)
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एआईएमआईएम: 5 सीटें
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अन्य: 8 सीटें
वोट शेयर:
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एनडीए: 37.26%
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महागठबंधन: 37.23%
इस आंकड़े से साफ है कि मुकाबला काफी कड़ा था। ऐसे में अगर मुस्लिम वोटों का कुछ प्रतिशत भी इधर-उधर होता है, तो वह परिणामों पर असर डाल सकता है।
वक्फ विधेयक में क्या बदलाव किया गया है?
वक्फ संशोधन विधेयक 2023 के जरिए सरकार ने वक्फ संपत्तियों की निगरानी और प्रबंधन को और पारदर्शी बनाने का दावा किया है। हालांकि मुस्लिम समुदाय का एक बड़ा वर्ग मानता है कि इससे उनकी धार्मिक स्वतंत्रता और संस्थागत स्वायत्तता पर असर पड़ेगा। बिल के तहत वक्फ बोर्डों को संपत्ति के उपयोग में बदलाव, रजिस्ट्रेशन और विवादों के समाधान के लिए नए नियम बनाए गए हैं। विरोधियों का तर्क है कि इससे सरकार को धार्मिक संपत्तियों में हस्तक्षेप करने की छूट मिलेगी।
नीतीश कुमार की रणनीति क्या है?
नीतीश कुमार एक चतुर और अनुभवी नेता माने जाते हैं। उनका फोकस इस समय बिहार के बहुसंख्यक वोट बैंक पर है। उन्होंने मुस्लिम समुदाय के लिए कब्रिस्तान, ईदगाह की जमीन, शिक्षा और रोजगार को लेकर कई योजनाएं शुरू कीं हैं। राजनीतिक जानकार मानते हैं कि नीतीश का ये कदम "एक तीर से दो निशाने" जैसी रणनीति हो सकती है — जहां वे एक ओर बहुसंख्यक मतदाताओं को साध रहे हैं तो दूसरी ओर मुस्लिम मतदाताओं के एक हिस्से को संभालने की कोशिश कर रहे हैं।
निष्कर्ष: चुनावी रणनीति या राजनीतिक मजबूरी?
वक्फ संशोधन विधेयक भले ही अब संसद से पारित हो चुका हो, लेकिन इसके राजनीतिक प्रभाव आने वाले महीनों में स्पष्ट होंगे। बिहार चुनाव में यह विधेयक कितना असर डालेगा, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि मुस्लिम नेताओं और समुदाय की नाराजगी को विपक्ष किस तरह मुद्दा बनाता है। एक ओर नीतीश कुमार हैं जो जातीय समीकरणों और सॉफ्ट हिंदुत्व की रणनीति के जरिए बहुमत के समीकरण बना रहे हैं, दूसरी ओर विपक्ष इस मुद्दे को जेडीयू के खिलाफ हथियार बना सकता है। लेकिन अंततः फैसला मतदाताओं के हाथ में है — और वे किस दिशा में झुकते हैं, यही बिहार की अगली सरकार तय करेगा।